Top 10 Quotes From Lord Krishna in Bhagavad Gita

Top 10 Quotes From Lord Krishna in Bhagavad Gita – The Bhagavad Gita is the greatest of India’s ancient spiritual classics. It is the essence of Vedic knowledge and one of the most important Upanisads in Vedic literature. If we want to take any particular medicine, then we need to follow the directions written on the label. We cannot take the medicine according to our whim or the direction of a friend. It must be taken according to the direction on the label or as directed by the physician.  Similarly, the Bhagavad Gita should be taken or accepted as it is directed by the speaker himself.  The speaker of the Bhagavad Gita is Lord Sri Krishna. He is mentioned on every page of the Bhagavad Gita as the Supreme Personality of Godhead, Bhagavan. Therefore we should take Bhagavad-gita As It Is directed by the Personality of Godhead Himself.

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भगवद गीता के अनुसार हमारा धर्म और कर्तव्य

भगवद गीता के अनुसार हमारा धर्म और कर्तव्य – Hare Krishna भगवद गीता के अनुसार हमारा धर्म और कर्तव्य भगवद्गीता को गीतोपनिषद भी कहा जाता है। यह वैदिक ज्ञान का सार है और वैदिक साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपनिषद,है ।

भगवत गीता के वक्ता भगवान श्रीकृष्ण है।भगवद्गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर उनका उल्लेख भगवान् के रूप में हुआ हैं। भगवान ने भी स्वयं भगवदगीता में अपने को परम पुरुषोत्तम भगवान कहा और ब्रह्म-संहिता तथा अन्य पुराणो में विशेषत्या श्रीमद भागवतम जो भागवत पुराण के नाम से विख्यात  है, वे इसी रूप में स्वीकार किये गये है (कृष्णुस्तु भगवान स्वयम्)| अतएव भगवद्गीता हमे भगवान ने जैसे  बताई है, वैसे ही स्वीकार करनी चाहिए।

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अध्याय ११ – विराट रूप ( सार )

अध्याय ११ – विराट रूप ( सार ) – अध्याय दस मे श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य का वर्णन है तथा अध्याय दस के अंत मे भगवान अर्जुन से कहते है कि मैं अपने एक अंशमात्र से सम्पूर्ण ब्रहमांड मे व्याप्त होकर इसे धारण करता हूँ | यह सुनकर अर्जुन भगवान से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें अपना विराट रूप दिखाए | अर्जुन इस बात को स्वीकार करते है कि श्रीकृष्ण एक साधारण मनुष्य नहीं है, अपितु समस्त कारणों के कारण है | किन्तु वह यह जानते है कि दूसरे लोग नहीं मानेंगे। अत: इस अध्याय में वह सबों के लिए कृष्ण की अलौकिकता स्थापित करने के लिए कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे अपना विराट रूप दिखलाएँ।

अध्याय ११ – विराट रूप ( सार )

वस्तुत: जब कोई अर्जुन की ही तरह कृष्ण के विराट रूप का दर्शन करता है, तो वह डर जाता है, किन्तु कृष्ण इतने दयालु हैं कि इस स्वरूप को दिखाने के तुरन्त बाद वे अपना मूलरूप धारण कर लेते हैं। भगवान् कृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और विश्व-रूप में अपना अद्भुत असीम रूप प्रकट करते हैं। इस प्रकार वे अपनी दिव्यता स्थापित करते हैं। कृष्ण बतलाते हैं कि उनका सर्व आकर्षक मानव-रूप ही ईश्वर का आदि रूप है। मनुष्य शुद्ध भक्ति के द्वारा ही इस रूप का दर्शन कर सकता है।

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 Importance Of Guru

 Importance Of Guru

जो अंधकार का निरोध करता है, उसे गुरु कहा जाता है ।

सच्चा गुरु भगवान का प्रतिनिधि होता है, और वह केवल भगवान के बारे में ही कहता है और कुछ नहीं। सच्चा गुरु वही है , जिसकी रुचि भौतिकवादी जीवन में नहीं होती। वह केवल और केवल भगवान की ही खोज में रहता है , यदि गुरु भगवान का प्रतिनिधित्व कर रहा है तो वह गुरु है।

केवल एक गुरु (सिद्ध पुरुष), जो ईश्वर को जानता है, दूसरों को सही ढंग से ईश्वर के बारे में शिक्षा दे सकता है। व्यक्ति को अपनी दिव्यता को पुनः पाने के लिए एक ऐसा ही सद्गुरु चाहिए। जो निष्ठापूर्वक सद्गुरु का अनुसरण करता है वह उसके समान हो जाता है, क्योंकि गुरु अपने शिष्य को अपने ही स्तर तक उठने में सहायता करता है।

महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन युद्ध करने से मना करते हैं तब श्री कृष्ण उन्हें उपदेश देते है और कर्म व धर्म के सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान से अवगत कराते हैं। स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकते हैं? इसका उत्तर श्रीकृष्ण इस श्लोक में देते हैं।

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हमें भगवत गीता कब पढ़नी चाहिए

जैसा की हम जानते है कक हमारे देश मे हर शुभ कार्य को करने का मुहूतय होता है जैसे हववाह मुहूतय, गृहप्रवेश मुहूतय, लगन मुहूतय और कोई भी शुभ काम जैसे नर्ा व्यवसार् आरंभ करना हो अथवा बालक का प्रथम अन्नप्राशन र्ा मुंडन करना और हवद्यारम्भ सब मुहूतय देख कर ककर्े जाते है | परन्तु क्र्ा अपने कभी सोचा है शास्त्र अध्र्र्न र्ा भगवद्गीता जो कक साक्षात् श्रीकृष्ण के मुख से अवतररत हुई है और इसे पढ़ना सबसे शुभ कार्य है, उसे भी पढने का कोई मुहूतय है | भगवद्गीता सम्पूणय मनुष्र्ों के लाभ के हलए एक महत्वपूणय पुस्तक है र्ह स्वर् भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अजुयन को कुरुक्षेत्र के र्ुद्ध मे जब अजुयन कतयव्य हवमूढ़ हो गए थे, अजुयन जो कक भगवान के हमत्र तथा भक्त है उन्हें ज्ञान प्रदान करने के हलए कही गर्ी तथा इसका संकलन व्यासदेव जी ने ककर्ा है |

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Bhagavad Gita Chapter 2 Summary – Contents of the Gītā Summarized

In Chapter 1 of the Bhagavad Gita, Arjuna sees his near and dear ones, teachers, and friends on the opposing side of the battlefield, ready to sacrifice their lives in the war. He becomes overwhelmed with grief and compassion, loses his strength, and his mind becomes bewildered; thus, he abandons his resolve to fight. In the second chapter, a Summary of the Bhagavad Gita, Arjuna, as a disciple, takes refuge in Lord Sri Krishna, and Krishna begins his teachings by explaining the distinction between the impermanent physical body and the eternal soul. Lord Sri Krishna describes the process of transmigration, the selfless service of the Supreme Lord, and the qualities of a self-realized person. We will divide this chapter into various sections and analyze the sections in depth.

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अध्याय ८ – अक्षरब्रहम योग (सार)

अध्याय ८ – अक्षरब्रहम योग (सार) – अध्याय ७ के अंत मे श्रीकृष्ण बताते है कि मनुष्य किस प्रकार ज्ञान अर्जन करें ?  जिससे वह पूर्णता को प्राप्त कर भगवद्धाम वापस जा सके | अष्टम् अध्याय मे श्रीकृष्ण बताते है कि भगवान के बारे मे जानने की विभिन्न प्रक्रिया है लेकिन भक्ति द्वारा तथा भगवान के भक्त बनकर हम आसानी से श्रीकृष्ण को जान सकते है तथा प्रयाण काल मे परम ज्ञान मे स्थिर होकर भगवान का स्मरण कर भगवद्धाम को प्राप्त कर सकते है |

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अध्याय ५ : कर्म – संन्यास योग

अध्याय ५ : कर्म – संन्यास योग – भगवद्गीता के पंचम अध्याय मे भगवान बताते है कि भक्तिपूर्वक किया गया कर्म, शुष्क चिंतन से बेहतर है | तृतीय अध्याय मे बताया गया कि जो व्यक्ति ज्ञान मे स्थित है उसके लिए कोई कर्म शेष नहीं रहता और चतुर्थ अध्याय मे बताया गया है कि सारे यज्ञों का सार ज्ञान प्राप्त करना है तथा भगवान कृष्णअर्जुन को निर्देश देते है,  “खड़े हो जाओ और ज्ञान में स्थित होकर युद्ध करो” | श्रीकृष्ण इस प्रकार भक्ति मे कर्म तथा ज्ञान से अकर्म करने को प्रोत्साहित कर रहे है | इससे अर्जुन दुविधा मे आ जाते है तथा पंचम अध्याय की शुरुआत इसी प्रश्न से होती है कि क्या बेहतर है,  “कर्म त्याग करना या भक्तिपूर्वक कर्म करना ?” | इसके समाधान में श्रीकृष्ण बताते है कि सभी कार्यो को श्री कृष्ण को समर्पित कर देना ही वास्तविक सन्यास है |

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